लोक समाज पार्टी
राजद्रोह कानून पिछले 7 बर्षों मे केंद्र व राज्य सरकारें अपने विफलताओं को छिपाने के लिये प्रयोग की।
दोस्तों प्रणाम–राजद्रोह कानून तानाशाही सत्ता अपनी विफलताओं को छिपाने के लाये करती आयी हैं,खास कर पिछले 7 सालों में।
फ्रीडम आफ स्पीच जो नागरिकों का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में मूलभूत अधिकार है उसको भी रौदते हुये राजद्रोह का कानून लगाना आम चलन हो गया है।
राजद्रोह कानून का इतिहास–
राजाद्रोह की परिभाषा भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 124 ए मूल रूप से मैकाले ड्राफ्ट पेनल कोड 1937-39 के धारा 113 मे दर्शाया गया था लेकिन आईपीसी 1860 से हटा लिया गया था।अर्थात 1860 मे लागू आईपीसी मे राजद्रोह का कानून लागू नही था।लंबी बहस के बाद 1870 मे सर जेम्स स्टीफन्स ने 124 ए को सम्मिलित किया तबसे राजद्रोह का कानून भारत मे लागू हुआ।
भारत मे124ए-राजद्रोह का पहला केस–
Queen Empress vs Jogendra Chandra Bose ILR19 Cal35
इस केस मे यह सिध्दांत प्रतिपादित किया गया कि मुंह बोले गये शब्द अगर सरकार के खिलाफ बुरी नियत से घृणा पैदा करने से हो तो राजद्रोह माना जायेगा।
जब भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी 1870 मे लागू किया गया कांग्रेस की स्थापना 1885 में हो चुकी थी। कांग्रेस के माध्यम से आजादी का आंदोलन तेज होता जा रहा था। स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने अपनी लेख मे ब्रिटिश हुकूमत के बारे लिखे तो उनके ऊपर भी राजद्रोह का केस लगा।जो उनको दोषी माना गया अंत मे बांबे हाई कोर्ट मे अपील की जो
Queen Empress vs Balgangadhar Tilak. I LR 22 Bom 112 वहां पर उनको सफलता नही मिली।
आजादी के बाद 1962 मे बिाहर सरकार के खिलाफ केदार नाथ सिहं के एक जन सभा मे भटकाऊ भाषण दिया जिसके कारण उन पर राजद्रोह का केस लगा अंत में वह मामला सुप्रीम कोर्ट मे पहुँचा जो
Kedar Nath Singh vs State of Bihar AIR1962SC 955 इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह सिंध्दात प्रतिपादित किया कि यह कोर्ट संविधान के भाग तीन मे दिये गये मूलभूत अधिकारों का कस्टोडियन यानी संरक्षक है इसलिये इस कोर्ट की ड्युटी बनती है कि उस कानून को रद्द कर दे जो फ्रीडम आफ स्पीच एंड इक्सप्रेसन का उलंधन करती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस केस में माना था कि केदार नाथ सिहं के भटकाऊ भाषण देने से कानून व्यवस्था बिगड़ने की हालात बनी थी इसलिये अपील को खारीज किये थे।
गौरतलब है कि जाने माने पत्रकार विनोद दुआ ने दिल्ली दंगों को लेकर अपने एक यु ट्यूब कार्यक्रम मे केंद्र सरकार को असहज करने वाले सवाल उठाये थे। उसे लेकर हिमांचल प्रदेश के एक भाजपा कार्यकर्ता ने उनके खिलाफ स्थानीय थान्हे में विभिन्न धाराओं मे प्राथमिकी यानी रपट दर्ज करवा दी थी उस कार्यकर्ता का आरोप था कि दुआ ने अपने कार्यक्रम के जरिये लोगों को उपद्रव के लिये उकसाने,प्रधानमंत्री की मानहानि करने, झूठी खबर फैलाने और राजद्रोह का प्रयास किया है। उस रपट के खिलाफ दुआ ने सुप्रीम कोर्ट मे संविधान की अनुच्छेद 32 के तहत याचिका लगाई जिसको सुप्रीम कोर्ट ने 1962 मे केदार नाथ सिहं के केस का हवाला देते हुये दुआ को आरोपो से मुक्त किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सिध्दांत प्रतिपादित किया कि मतभिन्नता या विचारो की विरोधी होना किसी भी रूप में राजद्रोह के दायरे में नही आता है। कोर्ट ने आगे कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ,सरकार की आलोचना और स्वतंत्र प्रेस किसी भी लोक प्रिय सरकार के कायदे व ढंग से काम करने के लिये जरूरी होते हैं।
सही मायने मे देखा जाय तो पत्रकार अंधेरा की नही रोशनी की बात करता है और समाज को किसी भी सरकार के कार्यों का रोशन करने रास्ता भी दिखाता है।पिछले सात सालों से यही देखने को मिला कि पत्रकार या विपक्ष सरकारी तंत्र की खामियां की तरफ ध्यान खीचता है तो उसको मुकदमों की सामना करना पड़ता है।अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार अभिव्यक्ति की आजादी व राजद्रोह के लेकर कोड आफ कंडक्ट बनाये जिसमे लक्षमण स्पष्ट रूप से खीची जानी चाहिए जिसको न तो नागिक व न ही सरकार लांघने का प्रयास करें।धन्यवाद।
गौरी शंकर शर्मा (एडवोकेट)
राष्ट्रीय अध्यक्ष लोक समाज पार्टी
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