लोक समाज पार्टी
हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिये जातिवाद व वंशवाद की गंगोत्री कोलेजियम व्यवस्था समाप्त करके लिखित परीक्षा का आयोजन करवाया जाना चाहिए।
दोस्तों प्रणाम++ भारत में हाई कोर्टों की स्थापना हाई कोर्ट एक्ट 1861के कानून से शुरूवात हुई उसी तहत हाई कोर्ट जजो की नियुक्ति होती थी।1935 में गौर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट लागू किया तो भारत मे उसके तहत हाई कोर्टों के लिये जजो की नियुक्ति होने लगी।
फिर स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान की अनुच्छेद 217 के तहत होने लगी। 1991 से 1996 तक नरसिह राव की सरकार जो जोड़ तोड़ की सरकार बनी थी।उसी मौके की फायदा उठाकर सुप्रीम कोर्ट ने खुद हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति अपने हाथों मे ले लिया जिसमे सुप्रीम कोर्ट के 5 सीनियर मोस्ट जजो की एक कमेटी होती जो अपने अपने लोगों को ही हाई कोर्ट जज बनवाते हैं।
कोलेजियम व्यवस्था जातिवाद व वंशवाद की गंगोत्री है।
कोलेजियम व्यवस्था के पहले भी व अब कोलेजियम व्यवस्था कुछ खास वर्ग के लोगों से हाई कोर्ट मे जज बनाने की पंरपरा विकसित कर लिया गया है।पूरे देश में 1950 से लेकर अब तक जजो की नियुक्ति की अव लोकन किया जाय तो यही मिलेगा कि देश में 40-50 घरानो के लोग ही हाई कोर्ट जज बनते। कोई न कोई एक दूसरे के रिस्तेदारी निकल जाते हैं। इस प्रकार देखा जाय तो यह व्यवस्था भी जातिवाद व वंशवाद की गंगोत्री है इसीलिये आम वर्ग के लोग न्याय से वंचित हो जाते हैं। इनमें से कोई जगमोहन लाल सिनहा जैसे विरले ही निकलते हैं जो इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिये थे वहीं अब सुप्रीम कोर्ट में ही ऐसे जज हुये है जो एक जाली डिग्री वाले को बचाने के लिये स्टे दिये हुये हुये हैं तथा राफेल के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा गिराते हुये व देश को न्याय से वंचित करते अपने राज्य सभा सांसद बन बैठे।
कोलेजियम व्यवस्था से संविधान के अनुच्छेद 14 का सरासर उलंघन होता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता व समान अवशर की सिध्दांत निहित है।कोलेजियम व्यवस्था में संविधान की अनुच्छेद 217 में निहित आवश्यक शर्तो को पूरा करने वाले देश के सभी एडवोकेट व न्यायिक व्यवस्था में काम करने वालों को अवशर ही नही मिलता हैं क्योकि आईएएस की तर्ज पर कोई नोटिफिकेसन नही होता है जिससे सभी लोग शामिल हो सके।यहां पर जब जज नियुक्त हो जाते है तब लोगों को पता चलता है।उसके पहले गुपचुप तरीके से सब मैनेज कर लिया जाता है। आप लोग खुद सोच सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के पास कौन ऐसी दुर्बीन है जिससे देश हाई कोर्टों में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट की प्रतिभा का अवलोकन कर लेते हैं? उनकी निगाह वहीं तक जाती है जो उन लोगों के रिस्तेदार होते हैं या सत्ता मे बैठे लोग मिल बैठकर कर आपस मे तय कर लेते है कि इन इन लोगों को ही करना है।

सबको अवशर मिले उसके लिये लिखित परीक्षा का आयोजन होना चाहिए ।
लोक समाज पार्टी के संविधान में यह व्यवस्था किया गया है हाई कोर्टों में जजों की नियुक्ति के लिये कोलेजियम व्यवस्था समाप्त करके आल इंडिया हाई कोर्ट जुडिसिल कमीसन बनाया जायेगा जिसमें जजो की नियुक्ति की जिम्मेदारी देश के ला प्रोफेसरों को दिया जायेगा जो स्वतंत्र इकाई होगा।वह लिखित परीक्षा का आयोजन करवायेगा, जो परीक्षा पास करेगा वही हाई कोर्ट जज बनेगा। कोई इंटरव्यू नही होगा क्योंकि हर नियुक्ति मे जहां इंटरव्यू होता वहीं जातिवाद का डंका बज जाता है।यही नही उसमे यह भी प्राविधान होगा कि नियुक्ति प्रकिया मे जो लोग गलत करेगें उनके खिलाफ 10 साल का जेल का प्राविधान होगा तथा सर्विस के दौरान जो वेतन लिये होगें वह सब वापस लेने का कानून बनेगा। आज किसी भी नियुक्ति में गलत नियुक्ति करने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नही होती है।
अत: आप लोग एक स्वतंत्रत न्यापालिका के लिये व हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में सबको समान अवसर मिले तो लोक समाज पार्टी के साथ जुड़े व पार्टी की वेबसाइट लोग आन सदस्यता निःशुल्क लीजिये।धन्यवाद।
गौरी शंकर शर्मा (एडवोकेट)
राष्ट्रीय अध्यक्ष लोक समाज पार्टी
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