लोक समाज पार्टी
देशद्रोह कानून को नये सिरे परिभाषित करने की जरुरत है क्योंकि देशद्रोह का आरोप मढ़ने का कल्चर डरी हुई सरकार का कल्चर बन गया है।
दोस्तों प्रणाम–जब देश में भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी 1860 में लागू किया गया था
तब देशद्रोह का कानून नही लागू किया गया था हालांकि लार्ड मैकाले की ड्राफ्ट कमेटी 1837-39 की धारा 113 में परिभाषित किया गया था। उसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिये जार्ज स्टीफेंस कमेटी मे देशद्रोह कानून को लागू करने सिफारिश की जो 1870 में आईपीसी में धारा 124ए को जोड़ दिया गया तब से भारत में देशद्रोह कानून लागू हो गया।
मार्च के 1922 में लाखों भारतीयों का महांत्मा गांधीजी नेतृत्व कर रहे थे।गांधीजी के द्वारा यंग इंडिया ने लेख लिखने के कारण देशद्रोह का मुकदमा चला।11/3/1922 को जब महांत्मा गांधीजी की कोर्ट में पेशी हुई तब उन्होने स्वीकार किया कि वह लेख उन्होने ही लिखा है और कोर्ट से बड़ी सजा की मांग कर डाली जिसको सुनकर कोर्ट में बैठे जज साहेब का सिर शर्म से झुक गया और उनका 6 महीने की सजा भी हुई थी।

यह कानून अंग्रेजी हुकूमत ने अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिये भारतीयों के खिलाफ देशद्रोह का कानून लाये थे। अब तो अंग्रेजी हुकूमत नही रही,तब यह प्रस्न उठता है कि क्या अब भी इस कानून की जरूरत है? बड़े मजे की बात है जिस ब्रिटेन की सत्ता ने विदेशो में अपनी हुकूमत कायम करने के लिये जो देशद्रोह कानून बनायी थी उसी के देश मे यह कानून समाप्त कर दिया गया है।
आजादी के बाद भी देशद्रोह का आरोप लोगों पर लगते रहें जिसमें 1962 में महत्वपूर्ण केस केदार नाथ सिहं का था वह सु्प्रीम कोर्ट मे पहुँचा तब सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सिध्दांत प्रतिपादित किया है कि सुप्रीम कोर्ट मूलभूत अधिकार की संरक्षक है इसलिये जो भी कानून मूलभूत अधिकार के विपरीत होगा वह अपने आपमें शून्य माना जाएगा। उन्होने यह भी कहा कि किसी सरकार का आलोचना करना फ्रीडम आफ स्पीच है

जो मूलभूत अधिकार है और यह संविधान की अनुच्छेद 19(1)(ए) में संरक्षित है। लेकिन उस केस में कोर्ट ने माना था कि केदार नाथ सिहं के स्पीच बिहार सरकार के खिलाफ द्वेषपूर्ण था जिससे हिंसा फैलाने के प्रयाप्त थी इसलिये उनकी अपील खारिज हुआ था।
AIR 1962 SC455.
केंद्र में व राज्यों मे भाजपा की जो सरकारें सत्ता पर काबिज है वे सभी पहली सरकारों को दिन रात आलोचना व धरना प्रदर्शन के बाद ही पहुंची है फिर भी उनको आलोचना से डर कर देशद्रोह का अंबार लगा रखी है।सरकारी आकड़ो के हिसाब से जुलाई 2014 से दिसंबर 2019 तक 590 लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा लगा।
जिसमे 10 लोगो को ही दोषी माना गया।अभी किसान आंदोलन मे कई लोगों पर देशद्रोह का अंदर जेल मे डाला गया जिसमे चर्चित व्यक्तित्व दिशा पटेल थी उसको दिल्ली सीबीआई की कोर्ट ने यह कहते हुये जमानत दी कि सरकार के खिलाफ बोलने से देशद्रोह नही बनता है।
ऐसे ही विनोद दुआ का मामला था जो यु ट्यूब पर दिल्ली दंगों को लेकर केंद्र सरकार से सवाल करके असहज किये थे तब हिमांचल प्रदेश में भाजपा कार्यकर्ता वाहवाही लूटने के लिये देशद्रोह का रपट लिखवाया जो अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने विनोद दुआजी को आरोप मुक्त किया।
वही सरकारें देशद्रोह व रासुका के हथियार बनाती हैं जो संविधान संम्मत कार्य नही करती है लोगों को डराने के लिये ये गैर कानूनी हथियार अपनाये जाते है।स्वस्थ लोकतंत्र के लिये फ्रीडम आफ स्पीच को मजबूत करना होगा जिसके लिये नये सिरे देशद्रोह को परिभाषित करने की जरूरत है धन्यवाद।
गौरी शंकर शर्मा (एडवोकेट)
राष्ट्रीय अध्यक्ष लोक समाज पार्टी
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